शेर-ओ-शायरी

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पहले शराब जीस्त थी, अब जीस्त है शराब,
कोई पिला रहा है, पिए जा रहा हूँ मैं।

-'जिगर' मुरादाबादी


1.जीस्त-जिन्दगी

 

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पीछे-पीछे हसरतों का काफिला,
आगे-आगे है परीशानी मेरी।

-'दिल' शाहजहाँपुरी
 

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पूछिए उससे कि दुनिया क्या थी और क्या हो गई,
जिसने घूँघट भी न उल्टा था कि बेवा हो गई।

-'जोश' मलीहाबादी
 

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फूल बनने की खुशी में मुस्कुरायी थी कली,
क्या खबर थी यह तबस्सुम मौत का पैगाम है।


1.तबस्सुम-मुस्कान

 

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