शेर-ओ-शायरी

<< Previous  रंज-ओ-ग़म  (Sorrows and sufferings) Next>> 

मिट भी सकती थी कभी, बेरोये छाती की जलन,
आग को पिघला लिया, फाहा भिगोने के लिए।
-आर्जू लखनवी


*****


मिटता है फौते-फुर्सते-हस्ती का गम कहीं,
उम्रे-अजीज सर्फे-इबादत ही क्यों न हो।

-मिर्जा 'गालिब'


1.फौते-फुर्सत-हस्ती
-जीवन की सूक्षम अवधि का नष्ट होना 2. उम्रे-अजीज- प्यारी उम्र 3.सर्फे-इबादत-उपासना या पूजा में लगा देना

 

(इस पूरे शेर का अभिप्राय यह है कि चाहे यह प्यारी उम्र उपासना

 में ही क्यों न  खर्च कर दी जाए, जीवन के इस सूक्ष्म
 अवधि के नष्ट होने का दुख नहीं मिट सकाता है क्यों कि  तब भी

दुख रहेगा कि और बहुत से काम हम न कर सके  और

सारी उम्र बीत गई)
 

*****

मिली राहत हुजूमे-यासो-गम में खून रो-रो कर,
लगी दिल की बुझाई तो कुछ दीदए-तर ने।

-दिल शाहजहाँपुरी


1.हुजूमे-यासो-गम -गम और निराशा का ढेर 2.दीदए–तर ने -आंसुओं ने

*****


मुआफ ऐ हमनशीं ! गर आह कोई लब पै आ जाए,
तबिअत रफ्ता – रफ्ता, खूगरे - दर्दे – जिगर होगी।

-नजर लखनवी


1.हमनशीं - साथ बैठने वाला, दोस्त 2. लब होंठ , ओष्ठ 3. रफ्ता–रफ्ता - धीरे-धीरे, अहिस्ता-अहिस्ता 4. खूगरे-दर्दे–जिगर - दिल के दर्द को सहने का आदी

*****

<< Previous   page -1-2-3-4-5-6-7-8-9-10-11-12-13-14-15-16-17-18-19-20-21-22-23-24-25-26-27-28-29-30-31-32-33-34-35-36-37-38-39-40-41-42-43-44-45-46-47-48-49-50-51-52-53-54-55-56-57-58 Next >>