शेर-ओ-शायरी

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मुझे खुद भी खबर नहीं है 'अख्तर',
जी रहा हूँ कि मर रहा हूँ मैं।
-'अख्तर' अंसारी


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मुझे समझाने आये हैं कि मै रोने से बाज आऊं,
मेरे समझाने वालों की नजर नम होती जाती है।
-आनन्द नारायण 'मुल्ला'

 

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मुनहसिर मरने पै हो जिसकी उम्मीद,
नाउम्मेदी उसकी देखा चाहिए।

-मिर्जा गालिब


1.मुनहसिर-
आधारित,निर्भर


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मुहब्बत तर्क की मैंने, गिरेबाँ सी लिया मैंने,
जमाने अब तो खुश हो जहर ये भी पी लिया मैंने।
अभी जिन्दा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ खल्वत में,
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने।
उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है,
कि कुछ मुद्दत हसीं ख्वाबों में खोकर जी लिया मैंने।

-साहिर लुधियानवी


1.
तर्क-छोड़ना, त्यागना
 
2.गिरेबाँ- कुर्ते या कमीज का गला, दामन 3.खल्वत-एकान्त, तन्हाई

 

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