शेर-ओ-शायरी

<< Previous  रंज-ओ-ग़म  (Sorrows and sufferings) Next>> 

यह शायरी नहीं है तमन्ना की कब्र पर,
तामीर एक ताजमहल कर रहा हूँ मैं।
जो जिन्दगी थी अस्ल में 'अख्तर' वह कट गई
जीने की शर्म रखने को अब जी रहा हूँ मैं।

-'अख्तर' अंसारी


1.तामीर- निर्माण
, बना
ना


*****
यह किस मुकाम पै आई जिन्दगी 'राही',
कि हर कदम पै अजब बेबसी का आलम है।

-अहमद राही

 

*****

यह भी मुमकिन नहीं मर जाएं,
जिन्दगी आह कितनी जालिम है।
-'अख्तर' अंसारी

 

*****


यहाँ उम्र भर जीना भी है दूभर,
कोई खुश होगा, उम्रे-जाविदां से।

-'साकिब' लखनवी


1.उम्रे-जाविदां-न खत्म होने वाली
उम्र 

 

*****

<< Previous   page -1-2-3-4-5-6-7-8-9-10-11-12-13-14-15-16-17-18-19-20-21-22-23-24-25-26-27-28-29-30-31-32-33-34-35-36-37-38-39-40-41-42-43-44-45-46-47-48-49-50-51-52-53-54-55-56-57-58  Next >>