शेर-ओ-शायरी

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वह नाजुक वक्त आ गया आखिरकार,
कि हर रंग तबियत पर गराँ है।

-'नातिक' लखनवी


1.गराँ- भारी, वज्नी


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वह पलकों पै आ गया बन के आंसू,
जबाँ पर न हम ला सके जो फसाना।

-हसरत सहबाई

 

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वीराना अगर देख लिया राहे-सफर में,
बढ़ता हूँ उसी सम्त को शायद मेरा घर है।

-'साकिब' लखनवी


1.सम्त-दिशा, ओर


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शाम ही से बुझा-बुझा रहता है,
दिल है गोया मुफलिस का चराग।

-मीरतकी 'मीर'


1.मुफलिस- दरिद्र, निर्धन, कंगाल, गरीब


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