शेर-ओ-शायरी

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दौरे-खिजाँ से अब तो बहला रहे हैं दिल को,
कांटों में फँस गये हैं, फूलों की दोस्ती में।

-आरिक बीकानेरी


1.दौरे-खिजाँ - पतझड़ का मौसम


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न इतराइए देर लगती है क्या?
जमाने को करवट बदलते हुए।

 

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न गुल अपना न खार अपना, न जालिम बागबाँ अपना,
बनाया आह किस गुलशन में हमने आशियाँ अपना।

1.बागबाँ - माली

 

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न थे चराग तो इक चाँदनी-सी फैली थी,
जले चराग तो अब घर में रौशनी कम है।

-'सहबा' उटावी

 

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