शेर-ओ-शायरी

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हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पै रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा होता।

-मोहम्मद इकबाल


1.दीदावर -
जौहरी, पारखी, किसी चीज का गुण-दोष अच्छी तरह समझने वाला

 

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हम कैद से रिहा जो हुए भी तो क्या हुआ,
जब गोशा-ए-चमन में नसीब आशियाँ न हो।

-'असर' लखनवी


1.गोशा - कोना
 

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हम न आये फिर चमन में लौटकर,
मौसमे-गुल बार-बार आता रहा।

-'अख्तर' हरिचन्द


1.मौसमे-गुल - बहार का मौसम

 
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हमको फंसना था कफस में क्या गिला सैयाद का,
बस तरसते ही रहे हैं आब और दाने को हम।

-'नजीर' अकबराबादी


1.कफस – पिंजड़ा2. सैयाद - बहेलिया, आखेटक, चिड़ीमार 3. आब - पानी

 

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