शेर-ओ-शायरी

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गुबारे-रहे-पसे-कारवाँ ही समझ लेते,
मेरा शुमार यहाँ तक भी कारवाँ में नहीं।
-'दिल' शाहजहाँपुरी


1.गुबारे-रहे-पसे-कारवाँ - कारवां के पीछे राह में उड़ने वाली धूल


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चुन लिया औरों ने गुलहाए-मुराद,
रह गए दामन ही फैलाने में हम।

-आजिज


1.गुलहाए-मुराद - अभिलषित फूल

 

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जब मैं चलूँ तो साया भी अपना साथ न दे,
जब तुम चलो, जमीं चले, आसमाँ चले।
-'जलील' मानिकपुरी

 

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जहाँ मैं हूँ वहाँ पुरसाने-गम कोई नहीं मेरा,
जहाँ तुम हो, पुरसाने-गम सारी खुदाई है।
-'कौल' जोधपुरी


1.पुरसाने-गम - दुख में हाल-चाल पूछने वाला


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