शेर-ओ-शायरी

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नई सुबह पर नजर है मगर आह यह भी डर है,
यह सहर भी रफ्ता-रफ्त कहीं शाम तक न पहुंचे।

-शकील बंदायुनी


1.सहर - सुबह, प्रातः 2.रफ्ता-रफ्त - अहिस्ता-अहिस्ता, धीरे -धीरे


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पढ़े जो गौर से तारीख के वरक हमने,
आंधियों में भी जलते हुए चराग मिले।

1.वरक - पन्ने।

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पत्थर तो रोज आते ही रहते हैं सहन में,
हल इसका यह नहीं है कि घर छोड़ दीजिए।

1.सहन - आंगन

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बिजलियां भी टूटेंगी, जलजले भी आयेंगे,
फूल मुस्कुराए हैं, फूल मुस्कुरायेंगे।

1. जलजले - भूकम्प

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