शेर-ओ-शायरी

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घर में मिलेंगे उतने ही छोटे कदों के लोग,
दरवाजे जिस मकान के जितने बुलंद हैं।

 

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जड़ मेरी आज उसी शख्स ने काट दी,
थक के बैठा था कल जो मेरी छांव में।

 

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जब डूब रहा था कोई, कोई भी न था साहिल पै,
इक भीड़ थी साहिल पर, जब डूब गया था कोई।


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जब-जब गैरों की इनायत देखी,
हमको अपनों के सितम याद आये।

 

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