शेर-ओ-शायरी

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जिन्हें जमीं पै भी चलने का शऊर नहीं,
उन्हीं का है यह तकाजा कि आसमाँ लेलो।


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जो काफिले खिजाँ से भी लूटे न जा सके,
लुट गए वो काफिले फस्ले-बहार में।

-राही शिहाबी


1.खिजाँ - पतझड़ की ऋतु 2.फस्ले-बहार- वसंत ऋतु

 

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जो पहुंचे चुके हैं मंजिल पर, उनको तो नहीं कुछ नाजे-सफर,
चलने का जिन्हें मक्दूर नहीं रफ्तार की बातें करते हैं।

-शकील बदायुनी


1.मक्îदूर - शक्ति, ताकत


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जोशे - तकसीम वारिसों का न पूछो,
जिद ये है कि मां की लाश कटके बंटे।

-आनन्द नारायण 'मुल्ला'


1.जोशे–तकसीम - बंटवारे का जुनून

 

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