शेर-ओ-शायरी

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सभी कुछ तो रहा है इस तरक्की के जमाने में,
मगर यह क्या गजब है आदमी इंसाँ नहीं होता।

-खुमार बाराबंकवी


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सलीके से जिन्हें एक घूंट भी पीना नहीं आता,
वह इतने हैं कि सारे मैकदे में छाए बैठे हैं।


1.मैकदा – शराबखाना

 

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सहारा न देती अगर मौजे-तूफां,
डुबो ही दिया था हमें नाखुदा ने।

-मकीन अहसन कलीम


1.
मौज-लहर, तरंग 2.नाखुदा- मल्लाह, कर्णधार


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सिज्दे करते भी है इंसां खुद दरे-इन्सां पै रोज,
और फिर कहते भी हैं बंदा खुदा होता नहीं।

-अर्श मल्सियानी


1.सिज्दा-इश्वर के लिए सर झुकाना, नमाज़ में जमीन पर सेर रखना

2.दरे-इन्सां पै - इंसान की चौकठ या दहलीज पर

 

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