शेर-ओ-शायरी

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इस दौर में इन्सान का चेहरा नहीं मिलता
कब से नकाबों की तहें खोल रहा हूँ।
 

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इस नये दौर में देखे हैं वो रहजन मैंने
जो बहारों को गुलिस्तां से चुरा ले जाए।
दे निगाहों को जो धोखा तो पता भी न चले
चाँदनी अंजुमे - ताबाँ से उठा ले जाए ।
इलाही आबरू रखना बड़ा नाजुक जमाना है,
दिलों में बुग्ज रहता है बजाहिर दोस्ताना है।


1रहजन - लुटेरा, डाकू, रास्ते में लूट लेने वाला  2अंजुमे–ताबाँ - आकाश के प्रकाशमान तारे  3.इलाही - हे खुदा

4बुग्ज - रंजिश, वैमनस्य

 

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इसी वास्ते है पैहम नजर, इस पै बिजलियों की,
है सजी हुई गुलों से, मेरी शाखे -आशियाना।


1.पैहम - लगातार, अनवरत

2.शाखे–आशियाना - डालियां जिस पर घोंसला बना हो


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उसे तो आपने गुलदस्ते की रौनक ही से मतलब है,
कहाँ गुलचीं के फुरसत है कि दर्दे-गुलसिताँ समझे।
-नीरज जैन


1. गुलची- फूल तोड़ने वाला माली


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