शेर-ओ-शायरी

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एक शख्स मिला था कड़ी धूप में मुझे

पानी की आरजू में लहू बेचता हुआ।
 

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एक से लगते हैं सब ही कौन अपना, कौन गैर

बेनकाब आये कोई तो, हम दरे -दिल वा करें।

-खलील


1दरे –दिल - दिल का दरवाजा

 2वा - खोलना

 

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एक ही उल्लू काफी है बर्बाद गुलिस्तां करने को।
हर शाख पै उल्लू बैठा है अंजामे-गुलिस्तां क्या होगा?

 

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कत्ले-इन्साँ हो रहा है चन्द सिक्कों के लिए,
इस कदर दौलत का भूखा आदमी पहले न था।


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