शेर-ओ-शायरी

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देख कर दिलकशी जमाने की,
आरजू है फरेब खाने की।

-अब्दुल हमीद 'अदम'


1. दिलकशी - मनोहरता, मनोज्ञता, सुन्दरता


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देखना है तो मेरा रंग खिजाँ में देखो,
फस्ले-गुल में तो हर चीज निखर जाती है।


1.खिजाँ - पतझड़ की ऋतु 2.फस्ले-गुल- वसंत ऋतु, बहार
 

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न खतरा है खिजाँ का, न उम्मीदे - बहारे - गुल,
नशेमन में कफस जैसी फरागत हो नहीं सकती।

-'अलम' मुजफ्फरनगरी


1.खिजाँ - पतझड़ की ऋत 2. नशेमन - आशियाना, घोंसला, नीड़

 3. कफस - पिंजड़ा, कारागार 4. फरागत - (i) सुख, आराम, चैन (ii) मुक्ति, नजात (iii) अवकाश फुर्सत


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न खिजाँ में है कोई तीरगी, न बहार में कोई रौशनी,
ये नजर-नजर के चराग हैं, कहीं जल गये, कहीं बुझ गये।

-'शायर' लखनवी


1. खिजाँ - पतझड़ की ऋत 2. तीरगी - अंधेरा, अंधकार


 

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