शेर-ओ-शायरी

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यह तो नहीं कि गम नहीं,
लेकिन मेरी आंख नम नहीं।
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'फिराक' गोरखपुरी


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यह देखकर कि बर्क का रूख इधर को नहीं,
निकले तलाशे-बर्क में खुद आशियाँ से हम।


1.बर्क -बिजली, चपला, तड़ित 2. आशियाँ- घोंसला, निशेमन, नीड़

 

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यह माना जिन्दगी है चार दिन की,
बहुत होते हैं यारों चार दिन भी।

-फिराक गोरखपुरी


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यह सोच ही रहे थे कि बहार खत्म हुई,
कहाँ चमन में निशेमन बने या न बने।

-जलील मानिकपुरी


1.निशेमन - आशियाना, घोंसला, नीड़


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