शेर-ओ-शायरी

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कट गई यह बहरे-गमे मौजों से हँसते-खेलते,
बहते-बहते देख आखिर आ लगे साहिल से हम।

- फिराक गोरखपुरी


1.बहरे-गमे - गमों का सागर

2. मौज - लहर, तरंग 3. साहिल - तट, किनारा


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कफस में खींच ले जाये मुकद्दर या नशेमन में,
हमें परवाजे-मतलब है, हवा कोई भी चलती हो।

-सीमाब अकबराबादी


1.नशेमन - आशियाना, घोंसला, नीड़ 2. परवाज - उड़ान

 

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कभी शाखे-सब्जा-ओ- बर्ग पर, कभी गुंचा-ओ-गुलो -खार पर,
मैं चमन में चाहे जहाँ रहूँ, मुझे हक है फस्ले - बहार पर।

-जिगर मुरादाबादी


1.शाखे-सब्जा - हरियाली से भरी टहनी 2. बर्ग -पत्ता, पत्ती 3.गुंचा - कली 4.फस्ले - बहार - बसन्त ऋतु, बहार का मौसम


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कर्ज की पीते थे मय, लेकिन समझते थे कि हाँ,
रंग लायेगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।

-मिर्जा गालिब


1.मय - शराब, मदिरा

2. फाकामस्ती - फाकों (निराहार, उपवास, अनशन) में बसर करना।

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