शेर-ओ-शायरी

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भरी दुनिया में कोई भी नजर आता नहीं अपना,
'अदीब' इक दौर ऐसा भी गुजर जाता है इंसा पर।

-अदीब


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मख्मूर अपने दिल में तकब्बुर न लाइए,
दुनिया में हर उरूज का एक दिन जवाल है।
मचलता होगा इन्हीं गालों पर शबाब कभी,
उबलती होगी इन्हीं आंखो से शराब कभी।
मगर अब इनमें वह पहली-सी कोई बात नहीं
जहाँ में आह किसी चीज की सबात नहीं।

-'अख्तर' शीरानी


1.मख्मूर - नशे में चूर उन्मत्त, मदोन्मत्त। 2. तकब्बुर - अभिमान, अहंकार, दर्प, गुरूर 3. उरूज - (i) ऊचाई , बुलंदी (ii) उत्कर्ष, उत्थान, उठान

(iii) उन्नति, तरक्की। 4. जवाल - (i) गिराव, पतन (ii) अवनति (iii) हास, कमी 5. शबाब - जवानी, युवावस्था 6. सबात - (i) दृढ़ता, स्थिरता,

 स्थायित्व, (ii) मजबूती, पायदारी।
 

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मर चुकीं सारी उम्मीदें 'अख्तर',
आरजू है कि जिये जाती है।

-अख्तर' अंसारी
 

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मर्ग मांदगी का इक वक्फा है,
यानी आगे बढ़ेगे दम लेकर।

-मीरतकी मीर


1.मर्ग - मृत्यु, मौत 2. मांदगी - शिथिलता, थकावट

3. वक्फा - दो कामों के बीच में ठहराव का समय, विराम, इन्टरवल, ठहराव
 

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