शेर-ओ-शायरी

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एक पर्दा है गमों का जिसको कहते हैं खुशी,
हम तबस्सुम में निहाँ अश्के-रवां रखते हैं।
-'अख्तर' अंसारी


1.तबस्सुम - मुस्कान, मुस्कुराहट, स्मित 2.निहाँ - गुप्त, छुपा हुआ 3.अश्के-रवां - बहते आँसू या अश्रु


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एक हँसती हुई परेशानी,
वाह क्या जिन्दगी हमारी है।

 

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एक लम्हा भी मसर्रत का बहुत होता है,
लोग जीने का सलीका ही कहाँ रखते हैं।


1.मसर्रत - खुशी, सुख-चैन


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एक है दोनों यास हो या उम्मीद,
एक तड़पाये और एक बहलाये।
-तमकीन सरमस्त


1. यास - निराशा, नैराश्य

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