शेर-ओ-शायरी

आसी उल्दानी (Aasi Uldani)  Next>>

अपनी हालत का खुद एहसास नहीं है हमको,
मैंने  यह औरों से सुना है कि  मैं परीशां हूँ।

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उसी महफिल से मैं रोता हुआ आया हूँ ऐ 'आसी',
इशारों से जहाँ  लाखों मुकद्दर  बदले जाते  हैं।

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कहते हैं उम्मीद  पै जीता है  जमाना,
क्या करे जिसकी कोई उम्मीद नहीं है?

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बहार आती है  और मैं  डर रहा  हूँ,
कि अक्सर मुझको रास आती नहीं है।
 

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