शेर-ओ-शायरी

अकबर इलाहाबादी (Akbar Illahbadi)  Next >>

इलाही कैसी - कैसी सूरतें तूने बनाई है,
कि हर सूरत कलेजे से लगा लेने के काबिल है।

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इस अंजुमन में आकर राहत नसीब किसको,
परवाना भी जलेगा और शम्मा भी जलेगी,
जन्नत बना सकेगा हरगिज न कोई इसको,
दुनिया यूँ ही चली है 'अकबर' यूँ ही चलेगी।

1.
अंजुमन - महफिल, बज्म

 

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जब चुप रहेगी जुबाने-खंजर,
लहू पुकारेगा आस्तीनों का।

1.
आस्तीन - बांह
 

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दुनिया में  हूँ,  दुनिया का तलबगार नहीं हूँ,
  बाजार से गुजरा हूँ खरीददार नहीं हूँ।
जिन्दा हूँ, मगर जीस्त की लज्जत नहीं बाकी,
    हरचन्द होश में हूँ होशियार नहीं हूँ।

1.तलबगार - ख्वाहिशमंद, मुश्ताक, इच्छुक, अभिलाषी

2.जीस्त - जिंदगी 3. होशियार - सचेत, हवास में

 

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