शेर-ओ-शायरी

अख्तर अंसारी  (Akhtar Ansari)  Next >>

'अख्तर' यह गम के दिन भी गुजर जायेंगे यूं ही,
 
     जैसे वह राहतों के जमाने गुजर गए।
 

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आसमाँ से कभी देखी न गई अपनी खुशी,
 
अब यह हालत है कि हम हँसते हुए डरते हैं।
 
 

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 इक दिन की बात हो तो उसे भूल जायें हम,
 
नाजिल हों दिल पै रोज बलायें तो क्या करें।

 
1. नाजिल - ऊपर से नीचे आने वाला, उतरने वाला, उतरा हुआ, आया हुआ

 

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एक पर्दा है गमों का जिसको कहते हैं खुशी,
 
हम तबस्सुम में निहाँ अश्के-रवां रखते हैं।

 1.
तबस्सुम - मुस्कान, मुस्कुराहट, स्मित 2.निहाँ - गुप्त, छुपा हुआ 3.अश्के-रवां - बहते आँसू या अश्रु
 

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