शेर-ओ-शायरी

अंदलीब शादानी (Andlib Shadani)  

चाहत के बदले हम तो बेच दें अपनी मर्जी तक,
कोई मिले तो दिल का गाहक, कोई हमें अपनाए तो।
 

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नादां सही, पर इतने नादान नहीं हैं हम,
खुद हमने जान-जान कर, कितने फरेब खाएं हैं।
 

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पहले कुछ और थे अरमान मरीजे गम के,
अब तो बस एक ही तमन्ना है आराम न हो।

1.मरीजे गम - विरह के दुख से संतप्त

 

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मायूसियों का दिल में वो आलम दमे-विद्अ,
बुझते हुए चराग की लौ जैसे थरथराए।

1.दमे-विद्अ - बिछुड़ते समय

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