इश्क मुझको नहीं वहशत ही सही,
मेरी
वहशत तेरी शोहरत ही सही,
कत्अ कीज न तअल्लुक हमसे,
कुछ
नहीं है तो अदावत ही सही।
हम भी दुश्मन तो नहीं है अपने,
गैर
से तुमको मुहब्बत ही सही,
हम कोई तर्के - वफा करते हैं,
न सही इश्क, मुसीबत ही सही।
अपनी हस्ती ही से होजा कुछ हो,
आगही
गर नहीं, गफलत ही सही,
हम भी तस्लीम की खू डालेंगे,
बेनियाजी तेरी आदत ही सही।
-मिर्जा गालिब
1.वहशत - दीवानगी, पागलपन
2.कत्अ- परित्याग, विच्छेद, अलग होना
3. तअल्लुक - संबंध
4.अदावत -दुश्मनी 5.तर्के–वफा -
वफा छोड़ना, वफा का परित्याग 6.आगही -
परिचय, जान-पहचान 7.गफलत -
उपेक्षा, बेपर्वाई 8.तस्लीम -
स्वीकार करना, मानना, कुबूल करना 9.खू -
आदत 10.बेनियाजी - उपेक्षा,
बेपर्वाई, बेतवज्जुही
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इस तरह से तुमने
क्यों देखा मुझे,
हर तमन्ना ख्वाब बनकर रह गई।
-सिकन्दर अली 'वज्द'
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इस नये दौर में देखे हैं वो रहजन मैंने
जो बहारों को गुलिस्तां से चुरा ले जाएं
दे निगाहों को धोखा तो पता भी न चले,
चाँदनी अंजुमे - ताबाँ से उठा ले जाएं
इलाही आबरू रखना बड़ा
नाजुक जमाना है,
दिलों में बुग्ज रहता है बजाहिर दोस्ताना है।
1.रहजन -
लुटेरा, डाकू, रास्ते में लूट लेने
वाला 2. अंजुमे – ताबाँ - आकाश के प्रकाशमान तारे 3. इलाही -
हे खुदा 4.बुग्ज - रंजिश,
वैमनस्य
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उन गुलों से तो कांटे अच्छे,
जिनसे होती है तौहीने- गुलशन।
1.तौहीने-गुलशन -
बगिया की बेइज्जती
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